बाबा कीनाराम
आदि गुरु, अघोरी परंपरा के प्रवर्तक एवं सेवा साधना के महान प्रतीक
बाबा कीनाराम भारतीय आध्यात्मिक इतिहास के उन महान संतों में गिने जाते हैं, जिनका जीवन केवल साधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के सबसे पीड़ित, उपेक्षित और रोगग्रस्त लोगों की सेवा को समर्पित रहा। उन्हें अघोरी संप्रदाय का आदि गुरु माना जाता है।
बाबा कीनाराम ने निर्भीक साधना के माध्यम से यह सिद्ध किया कि ईश्वर की प्राप्ति केवल त्याग और तपस्या से ही नहीं, बल्कि करुणा, सेवा और मानव कल्याण से भी होती है। उनका जीवन समाज के लिए एक जीवंत संदेश है कि सेवा ही सच्ची साधना है।
उन्होंने जाति, धर्म, रोग और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर हर पीड़ित मानव को ईश्वर का स्वरूप माना। वाराणसी स्थित क्रीं-कुंड आश्रम उनकी साधना, करुणा और सेवा परंपरा का जीवंत केंद्र रहा है।
📚 जीवन यात्रा (Timeline)
- 1601 – बाबा कीनाराम का जन्म एक ऐसे युग में हुआ जब भारत में गहन आध्यात्मिक साधनाएँ प्रचलित थीं।
- यौवन काल – कठोर तपस्या, श्मशान साधना और अघोरी परंपरा के गूढ़ रहस्यों का अनुभव।
- वाराणसी – क्रीं-कुंड आश्रम की स्थापना, जो आगे चलकर अघोरी साधना एवं सेवा का प्रमुख केंद्र बना।
- जीवनकाल – रोगियों, कुष्ठ पीड़ितों और समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की निःस्वार्थ सेवा।
- 1771 – महासमाधि; परंतु उनकी सेवा परंपरा आज भी जीवंत है।
🕉️ अघोरी परंपरा
अघोरी परंपरा जीवन और मृत्यु, पवित्र और अपवित्र के द्वैत को समाप्त कर परम सत्य की अनुभूति पर आधारित है। इस मार्ग को सामान्यतः भय और रहस्य से जोड़ा गया, परंतु बाबा कीनाराम ने इसे करुणा, चिकित्सा और मानव सेवा से जोड़ा।
उनके अनुसार, अघोरी साधना का उद्देश्य समाज से कटना नहीं, बल्कि समाज के सबसे पीड़ित वर्ग को अपनाना है। यही कारण है कि उनकी परंपरा आज भी सेवा और मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
📜 Biography PDF
बाबा कीनाराम के जीवन, साधना और सेवा परंपरा का विस्तृत विवरण नीचे दिए गए PDF में उपलब्ध है।
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